Kuch Alfaaz

कहाँ टूटी हैं ज़ंजीरें हमारी कहाँ बदली हैं तक़रीरें हमारी वतन था ज़ेहन में ज़िंदाँ नहीं था चमन ख़्वाबों का यूँँ वीराँ नहीं था बहारों ने दिए वो दाग़ हम को नज़र आता है मक़्तल बाग़ हम को घरों को छोड़ कर जब हम चले थे हमारे दिल में क्या क्या वलवले थे ये सोचा था हमारा राज होगा सर-ए-मेहनत-कशाँ पर ताज होगा न लूटेगा कोई मेहनत किसी की मिलेगी सब को दौलत ज़िंदगी की न चाटेंगी हमारा ख़ूँ मशीनें बनेंगी रश्क-ए-जन्नत ये ज़मीनें कोई गौहर कोई आदम न होगा किसी को रहज़नों का ग़म न होगा लुटी हर-गाम पर उम्मीद अपनी मोहर्रम बन गई हर ईद अपनी मुसल्लत है सरों पर रात अब तक वही है सूरत-ए-हालात अब तक

Habib Jalib
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