"आ जाओ ना बाबा मुझ को नाती कौन पुकारेगा" आप जो मुझ सेे दूर हुए अब मुझ को मौन पुकारेगा आजाओ ना बाबा मुझ को नाती कौन पुकारेगा घर के हर सामान पे हरदम आप का पहरा रहता था मेरा बाहर छूट गया जो आप को फोन पुकारेगा एक बड़े बरगद के जैसे पूरे घर पे छाया थी घर का हर एक बच्चा-बच्चा शनि से सोम पुकारेगा एक हमारी दादी हैं जो दिन भर रोया करती हैं रो रो कर वो कहती हैं अब मुझ को कौन पुकारेगा एक बुआ बाहर रोती हैं एक बुआ तो आँगन में दोनों रो कर कहती हैं अब बेटी कौन पुकारेगा कर्म आप के अच्छे थे ये धरती-अम्बर जाना है हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हर एक कौम पुकारेगा धूप धूल और बारिश से घर की रखवाली करते थे ऐसा पेड़ जिसे भी मिले वो हर एक यौम पुकारेगा मैं तो ठहरा छोटा बालक मेरी अभी उमर है क्या बाबा के साए में था जो रोम-रोम पुकारेगा
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