आह-ओ-फ़ुग़ाँ - किसी से बिछड़ने का मातम मनाने का मौका मिलेगा तभी तो ये शाइ'र ग़ज़ल कह सकेगा वगरना मुझे क्या बदन ही बदन हैं यहाँ शे'र पढ़ दूँ वहाँ वाह सुन लूँ इधर साथ छोड़ूँ उधर हाथ थामूँ पुरानी ग़ज़ल में नए शे'र जोड़ूँ कहीं दिल लगा लूँ कहीं दिल को तोड़ूँ मुझे क्या मुझे तो जिए जाना है बस मुहब्बत मुहब्बत किए जाना है बस मगर मेरे लोगों ज़रा ये तो सोचो मुहब्बत की मारी ये नस्लें तुम्हारी बिछड़ने के दुख से निकल भी सकेंगी अगर लड़खड़ाईं सँभल भी सकेंगी भला किस के लिक्खे ग़ज़ल पढ़ के इनको लगेगा कि आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी है
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