आइना मैं किसी का आइना हूँ और ऐसा आइना हूँ जब कभी मुझ में वो ख़ुद को देखता है सोचता है क्या हसीं सच में है इतना वो या उस को मैं हसीं दिखला रहा हूँ बन-सँवर कर फिर वो चलता है लटें खोले हुए और देखता है बारहा ख़ुद को पलट कर और फिर वो सोचता है क्या मैं सच्चा हूँ या झूठा हूँ मगर फिर दिल ही दिल में वो ख़ुशी से मुस्कुरा कर सोचता है आइना सच बोलता है हाँ मगर जब भी कभी मैं उस को उस की ख़ामियों से रू-ब-रू करवाऊँ तब वो घूरता है इस क़दर मुझ को के जैसे जुर्म कोई कर दिया हो उस की आँखों से छलकता है ग़ज़ब ऐसा के जैसे घूर कर ही तोड़ देगा वो मुझे और छोड़ देगा ज़र्रा ज़र्रा इस ज़मीं पर और फिर धीरे से उठ कर वो चला जाता है मेरे सामने से फिर पलट कर भी नहीं मुझ को कभी वो देखता है और दिल ही दिल में ख़ुद से बोलता है इस जहाँ में कोई भी सच्चा नहीं अपना नहीं आइना झूठा है इस की बात में आना नहीं।
Create Image