"निफ़ाक़" आईना जो भी कहता है झूठ को सच नहीं करता आईने के हज़ार टुकड़े हों फिर भी मंज़र वही रहता आईना गर मुअय्यन हो सबके लिए बराबर हो एक को मर्तबे मनसब एक को जेल की दीवारें हों
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