आज बहुत फ़ुर्सत में हूँ तेरे ख़त जलाने बैठा हूँ सोचा पढ़ लूँ आख़िरी दफ़ा मैं फिर मुहब्बत कर बैठा हूँ सोचा था क़लम छोड़ दूँगा मैं फिर ग़ज़ल लिख बैठा हूँ झुमके, कंगन, बालियाँ, बिंदी मैं फिर हसरतें लिए बैठा हूँ मैं ख़ुश हूँ बस यूँँही आज भूलना था, याद लिए बैठा हूँ ख़्वाहिशें जो रही अधूरी अब तक पूरी हों यही आस लिए बैठा हूँ तुझे आज़ाद कर चुका हूँ कब से बस ख़ुद को क़ैद किए बैठा हूँ
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