"मु'आइना" आज बैठा नहीं है कोई उस के दर पे, जनाब! आज मौजूद है ही नहीं क्या कोई उस के घर पे, जनाब? छत की रेलिंग पे हैं कुछ तो कपड़े पड़े गो हों महबूब के पर वहाँ पर भी मौजूदगी का नहीं कुछ गुमाँ होगी शायद वो कमरे में लेटे पड़े बिस्तरे पर ही आराम से इक अजब सी ख़मोशी भरी ये फ़ज़ा और रंगत बदलता हुआ आसमाँ मुझ को मालूम है ये है उस की ख़ता उस ने सूरज से पर्दा किया कहने को इक ज़रा भी नहीं चल रही है हवा और कपड़े वहीं के वहीं पर हैं लटके हुए जैसे मेरे मुक़द्दर का ताला है लटका हुआ और अफ़सुर्दगी को फ़ज़ा में बिखेरे ये सूरज भी ढल ही गया सर के ऊपर गुज़रते अचानक कोई पंछी चहकाई है छत पे देखा तो मुमकिन है वो ही नज़र आई हो और इसी वसवसे में बहुत धीरे-धीरे से इस तीरगी के वजह से मेरे आँखों से अब बिछड़ती ये बीनाई है दो ही इमकान हैं छत पे वो आई हो या वही आई हो फिर भी ऐन-ए-यक़ीं से उसे अब तलक मैं ने देखा नहीं क्या अजब है कि मग़रिब है और वो अभी तक है सोई हुई सब्र करना है तो सब्र ही करता हूँ अब मैं चलता हूँ मरने कि उठकर फिर उस के लिए मर सकूँ अब मैं चलता हूँ उस पर सलामुन 'अलैक
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