Kuch Alfaaz

"ज़िंदगी ख़्वाब सी" आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं लोग जैसे पेड़ों से छीनी हुई छाँव जैसे समुंदर में दूर खोई हुई नाव ये वक़्त भी अजीब चीज़ होती है ना वक़्त गुजरते वक़्त नहीं लगता है ना और जब आगे देखता हूँ तो ख़्वाब दिखते हैं वो ख़्वाब जिन में मैं बस खो जाना चाहता हूँ जिन में खो कर बह जाना चाहता हूँ वो सारे ख़्वाब जिन का होकर रह जाना चाहता हूँ आज भी जब कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीते वक़्त से ज़्यादा लोग दिखते हैं

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