Kuch Alfaaz

"आज फिर" आज फिर तेरा चेहरा दिखा आज फिर दिल में उम्मीद जगी आज फिर तुझ सेे बात करने की मेरे दिल में इक रीझ जगी पर बोल न पाया कुछ भी मैं आज फिर मैं चुप-चाप रहा आज फिर तुझ सेे बातें बयाँ करने का ख़्वाब बस इक ख़्वाब रहा तेरे चेहरे को भी उतना जी भर के देख न पाया आज फिर मेरे दिल ने आँखों को बहुत उकसाया पर बातें बयाँ हुई न और आँखें चुप-चाप रही आज फिर वही पहले जैसी बेस्वादी मुलाक़ात रही

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