Kuch Alfaaz

मुझे देखो मुझे सोचो मुझे समझो मिरी बेबाक नज़रों की तहों में कोई मजबूरी नहीं है मिरा इदराक है जो मुझ को मेरे ख़ैर पे होने की मसनद पर बिठाता है मुझे ये इल्म है कि मैं उजालों की तरह से फैल जाती हूँ हक़ीक़त रोज़-ए-रौशन है जहाँ हर इक चमकती रेत पानी बन नहीं सकती हक़ीक़त अपनी फ़ितरत में कहानी बन नहीं सकती मिरी बेबाक-नज़री का ग़लत मतलब न ले लेना मुझे बहरूप भरने की अदा आती नहीं है मुझे घुट घुट के जीने की अदा आती नहीं है मिरा इदराक है जो मुझ को मेरे ख़ैर पर होने की मसनद पर बिठाता है मैं ऐसी हूँ दिखाना चाहती हूँ मैं कैसी हूँ बताना चाहती हूँ मुझे देखो मुझे सोचो मुझे समझो मैं औरत हूँ हक़ीक़त हूँ

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