आज फिर तेज बारिश आई और बहा ले गई एक मजदूर की झोपड़ी एक चिड़िया का घोंसला एक किसान का खेत एक दीवार जो कल ही ग़रीब मजदूर औरतों ने तपती धूप में बनाई थी बस नहीं बहा पाई तो भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी वो आलीशान इमारत जो तेज बारिश पर हँसती थी एक सवाल अब भी ज़ेहन में कौंधता है क्या प्रकृति का न्याय करने का यही तरीका है।
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