Kuch Alfaaz

"यादें" आज फिर याद आए वो कुछ याद पुराने अब क्या ही कहें कि कितने हैं प्यारे जैसे दिखते है आसमाँ में वो चाँद-सितारे समझ लो कुछ वैसे ही प्यारे वैसे ही न्यारे वो बचपन की रेल वो बचपन के खेल चाहे वो लुका-छिपी या फिर हो साथ में वो पकड़म-पकड़ाई पर क्या करें सब तो बन कर रह गई हैं बस यादें याद आई वो इक बात जिस सेे होती है आँखों में बरसात वो पापा की डाँट और मनाना भी साथ जिस सेे हम जाते थे डर फिर हम ढूँढ़ने थे लगते माँ का वो आँचल जिस में थे हम महफ़ूज फिर हम देखते थे दूर से ही छिप कर और भी हैं बहुत सी बातें पर क्या करें सब तो बन कर रह गई हैं बस यादें

Ritesh kumar
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