"आख़िरी मुलाक़ात" याद आता है इक दफ़ा उस ने दाहिने हाथ की कलाई पे यूँँ ही कुछ उँगलियाँ घुमाई थी क्या लिखा था मुझे ये याद नहीं फिर अचानक ही मुझ को देखा था देख कर उस को ऐसा लगता था जैसे कुछ आरज़ू जताई हो होंठ ख़ामोश थे मगर उस की कत्थई आँखें कह रही थी कुछ कुछ तो था जो वो कह नहीं पाई कुछ तो था जो मुझे समझना था इस सेे पहले मैं कुछ समझ पाता नर्म पलकें झुका लिए उस ने अपने आँसू छुपा लिए उस ने हम ने पूछा कि क्या हुआ आख़िर काँपते होंठों से कहा उस ने के ये बरसात आख़िरी होगी ये मुलाक़ात आख़िरी होगी
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