Kuch Alfaaz

हमें हर खेल में हर बात पर ऐ मात के ख़्वाहाँ कभी खींचेंगे हम बागें जुनूनी सर-फिरी अंधी हवाओं की उड़ाएँगे फ़लक पर चाँद तारों से बने रथ को फिर आएँगे तुझे हमराह करने सुरमई धुँदले जज़ीरों से सुनहरी आस रंगी सर ज़मीं तक नए मोहरों से फिर अपना पुराना खेल खेलेंगे तिरी हर मात की हर चाल को शह-मात देखेंगे

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