Kuch Alfaaz

'आज फिर तेरी याद आ रही है' आज फिर तेरी याद आ रही है ये तक़दीर मुझे तेरी ओर ले जा रही है मेरे ज़ेहन में फिर से तेरी सूरत समा रही है मेरे कानों में फिर तेरी आवाज़ गुनगुना रही है मेरी आँखों से नींद फिर रूठ सी गई है मेरी ज़िन्दगी से हँसी कुछ छूट सी गई है मेरे चेहरे पे जैसे इक उदासी सी छाई है इन होंठों पे फिर कोई ख़ामोशी घिर आई है न जाने ये दिल मेरा कहाँ खो गया है आज फिर पूछ रहे हैं लोग ये मुझे क्या हो गया है मेरे लबों ने फिर वही बातें दोहराई हैं कुछ नहीं हुआ कह कर मैं ने पलकें झपकाई हैं आज फिर मैं ने दुनिया से अपना हाल छुपाया है ये दिल मायूस है मगर होंठों ने मुस्कुराया है आज फिर मेरे हँसते दिल को उन ग़मों ने पुकारा है मेरे भीतर के चकोर ने फिर चाँद को घंटों निहारा है आज फिर बहती फ़िज़ाओं ने मुझ सेे मुँह फेरा है आज फिर अकेलेपन ने मेरे मन को घेरा है ढ़लती शाम ने फिर आँखों को सताया है बरसती घटाओं ने फिर बाहों को तरसाया है ये क़ुदरत मुझ पर फिर से क़हर बरपा रही है हर धड़कन मेरी फिर से तुझे पास बुला रही है आज फिर तेरी याद आ रही है

Rehaan
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