Kuch Alfaaz

हँसी रुकी तो फिर से माँओं पंजों के बल चलती चलती बाज़ू के रेशम पे फिसलती गर्दन की घाटी से हो कर कान की दीवारों पर चढ़ती इन्द्र के दालान में कूदी और बदन इक साग़र सा बीमार बदन सारे का सारा हँसी की चढ़ती नदी की आफ़ात भरी लज़्ज़त के अंदर झटके खाता चीख़ उठा बस अब्बू रोको उस माँओं को अब्बू आगे मत आए ये माँओं और अब्बू ने रोक दिया अपनी उँगली को और बिल्ली इक जस्त लगा कर अब्बू के सीने में उतरी और फिर उस के तन की लंबी शिरयानों में पंजों के बल चलती चलती उस की आँख में आ पहुँची है घाट लगा कर आँसू की चिलमन के पीछे बैठ गई है

Wazir Agha
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