थकी हारी चिड़ियों के इक ग़ोल की तरह जब शाम उतरी घने बरगदों पर मेरी कल्पनाओं के पंछी लिए अपनी चोंचों में तिनके उड़े उन पुर-असरार अंधी दिशाओं की जानिब जहाँ आग के जंगलों में मिरी आत्मा कितनी सदियों से ब्याकुल कोई आशियाँ ढूँढती है
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