Kuch Alfaaz

“आशियाना मेरा” मुश्किलों से बना है ठिकाना मेरा घर नहीं ये तो है आशियाना मेरा ख़्वाबों के ईंट पर है टिकाया इसे बेच कर अपनी नींदें है पाया इसे बस इसी से ही है आब-ओ-दाना मेरा घर नहीं ये तो है आशियाना मेरा सौदा भी है किया अपने ईमान का घोंटा भी है गला अपने अरमान का तब कहीं है बना ये ठिकाना मेरा घर नहीं ये तो है आशियाना मेरा ज़िन्दगी की यहीं से थी की जुस्तुजू अब यही आख़िरी है मेरी आरज़ू ख़त्म हो अब यहीं पर फ़साना मेरा घर नहीं ये तो है आशियाना मेरा

SHIV SAFAR
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