Kuch Alfaaz

आसमानी सीढ़ी मैं यही समझा था अब तक तुम भी हर लड़की के जैसी आम हो पर मैं ग़लत था तुम को जन्नत में ख़ुदा ने सात में से एक दिन ले कर बनाया और उतारा है ज़मीं पर आसमानी सीढ़ियों से एक ग़लती जो ख़ुदा से हो गई वो ये कि तुम को शाइरों के बीच भेजा तुम सेे पहले हम सभी में इस तरह झगड़े नहीं थे अब ये आलम हो चुका है शा'इरी कोई फ़न नहीं है जंग है अब जो कोई भी इस में जीतेगा वो तुम को पाएगा या फिर नहीं, ये तय नहीं है फिर भी हर पल हर कहीं, सब लड़ रहे हैं हर तरफ़ मिसरों की तलवारें बिना इक दम लिए बस तुम्हें पाने की ख़ातिर टूटने पर आ चुकी हैं लोग अपनी नज़्मों के उनवान तुम पर रख रहे हैं दूसरों के लिक्खे की तनक़ीद जमकर कर रहे हैं एक मक़सद है सभी का, दूसरा कैसे भी हारे पर नहीं समझे कि ऐसी जंग कब रुकती है प्यारे जो तुम्हें पाने की ख़ातिर लड़ रहे हैं, मर रहे हैं मुझ को लगता है वो सारे भूल कोई कर रहे हैं मैं जो तुम को पाने की उम्मीद लगभग खो चुका हूँ आसमानी सीढ़ी के नज़दीक जा कर देखता हूँ तुम ने जिस भी सत्ह पर पाँव धरा है वो हरी है, बाकी सब कुछ ज़र्द है, और ये सब देख कर ही मैं ये समझा हूँ अभी तक, तुम को पा लेना असल में जंग का हासिल नहीं है आसमानी सीढ़ियों से तुम को याँ पर इस लिए भेजा है ताकि इस जहाँ में जो भी चीज़ें ज़र्द होने को हैं उन को उन का असली रंग हासिल हो सके। मैं जो अपने सारे ही रंगों को अबतक खो चुका हूँ बस इसी उम्मीद में सीढ़ी पे चढ़ता जा रहा हूँ और तुम्हारे पाँव के हर नक़्श चू में जा रहा हूँ।

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