"आसमानी क़र्ज़" अंबर तुम इतने आला हो लेकिन तुम भी हमारे जैसे बे-हद क़र्ज़ में क्यूँँ जीते हो धरती से न मिलो हरगिज़ तुम पर ख़ासी यारी रखते हो उस की बेहद दौलत पर क्यूँँ आँख गड़ाए तुम रहते हो अब ये तुम ही जानो कैसे ये इफ़रात उधारी ले कर तुम बुनते हो तारे उन सेे दो-शाला अपना सीते हो सुनते आए हैं बचपन से सदियों से ऐसा करते हो अच्छा वो सब ठीक है लेकिन अंबर बस इतना बतला दो धरती का ये क़र्ज़ चुकाने की परवाह कभी करते हो
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