Kuch Alfaaz

आसमानी पर हरे भरे शजर वो और कुछ बंदर हैं बाग़ में इक शाम क्या ख़ूब मंज़र है सुर्ख़ पौधों को निहारते हुए बैठी है फूलों को छूते हुए लगे वो रूठी है शाख़ दर शाख़ बाग़ ख़ूब महकता है तितलियों सी रंगीन वो भी लगती है पर उस के शायद अब खुल गए हैं सरगिरानी भरे हालात बदल गए हैं एहसास होता है अभी ये मुझ को भी आसमानी पर जैसे उसे मिल गए हैं

WhatsAppXTelegram
Create Image