आवारगी मुख़्तसर लम्हों से याद आ गई आवारगी तुझे पाने की आरज़ू में क़ाएम थे हम सँवरे सँवरे तेरी तिश्नगी में खो जाते थे हम तय जो किया था वो भूल जाते थे हम ऐ आवारगी तेरे इश्क़ में खो जाते थे हम ऐ आवारगी शहर-ए-निगाराँ में तुझे ढूंँढ़ते थे हम इस क़दर गोते लगाकर गुम हो जाते थे हम एक बार जो कहना था वो कह न पाए ऐ आवारगी ज़ुल्मते शब में तुझे खोजते रहे ऐ आवारगी ख़्वाबों में भी नज़रों से नज़र हटती नहीं मौसम-ए-ख़िज़ाँ की तरह चाहत कम न हो जाए अब तन्हा कहाँ तुझे सोच के हम ऐ आवारगी
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