वापसी वापसी शिकस्ता बूढ़े शहर तेरी गलियाँ न जाने कब से उखड़े हुए साँसों की तरह बाहम उलझती रही हैं मिट्टी और फ़ौलाद और लकड़ी के शहर में मुक़द्दर की मिसाल एक बार फिर पलट आया हूँ
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