Kuch Alfaaz

अब वक़्त-ए-सफ़र आ पहुँचा है आ मिल बैठें दो-चार घड़ी जब पहले-पहल तुम आए थे आग़ाज़-ए-सहर का मेला था कुछ किरनें मद्धम मद्धम थीं कुछ उजला उजला धुँदलका था कुछ ऐसी उमंगें थीं दिल में जो सरकश भी मा'सूम भी थीं कुछ हस्ती बोलती नज़रें थीं जो शोख़ भी बे-मफ़्हूम भी थीं सूरज की उभरती किरनें भी यूँँ खेल रही थीं पहाड़ों पर जिस तरह हवा अंगारों पर नज़रें थीं मिरी कोहसारों पर फिर धूप चढ़ी मौसम बदला हालात की गर्दिश तेज़ हुई बाहर की फ़ज़ा हैजानी थी अंदर के तलातुम ख़ेज़ हुई कुछ ऐसी बला की शिद्दत से टकराओ हुआ तूफ़ानों का जो क़द्रें थीं पामाल हुईं जो ख़्वाब थे चकना-चूर हुए चंद एक लम्हे हाँ लेकिन फ़र्दा के जो ख़द्द-ओ-ख़ाल बने जो हाल से इस्तिक़बाल बने कुछ यादें जी का वबाल हुईं कुछ ज़ख़्म कि जो नासूर बने कुछ अश्क जो ग़ालिब आ के रहे तूफ़ान के सरकश धारों पर तूफ़ाँ के थपेड़ों में भी कभी जब मुड़ के देखा किनारों पर पाँव थे अना की रकाबों में नज़रें थीं मिरी कोहसारों पर अब दिन का मेला ख़त्म हुआ अब धूप चढ़ी दीवारों पर अब अँधियारों का मेला है ग़ारों शहरों कोहसारों पर अब राख चढ़ी अंगारों पर अब वक़्त-ए-सफ़र आ पहुँचा है आ मिल बैठें दो-चार घड़ी

Rabia Fakhri
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