"अब तो लौट आओ" ये घर अब मकाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ सारा गाँव वीराँ हो चुका है, अब तो लौट आओ गाँव के आख़िर में एक दरिया था ये कहूँ कि मेरा नज़रिया था शीतल था जल उस का, मद्धम मद्धम बहता था आ कर मेरे कानों में, कोई ग़ज़ल कहता था वो मीठा जल अब सूख चुका है कहीं समुंदर में जा कर मिल चुका है वो दरिया अब दरिया नहीं रहा खारे पानी की दुकाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ दरिया किनारे वो पीपल का पेड़, शीतल छाँव देता था, हवा संग लहराता था मैं पूरे दिन बस वहीं रहता था एक हवा का झोंका था सुकून भरा, सादगी भरा तन को, मन को, जो करता हरा सुब्ह को जाता था, शाम हुए लौट कर आता था अब वो झोंका भी कई दिनों से लौटा नहीं मालूम हुआ भयंकर तूफाँ हो चुका है, अब तो लौट आओ वो गाँव का चबूतरा, वो बरगद का पेड़ उस के बाजू में वो मिट्टी का ढेर बच्चे जहाँ घरौंदे बना कर खेलते थे उस पेड़ के साए में कुछ पंछी रहते थे वो बूढ़ा बाज़, मेरा दर्द, मेरे दिल की आवाज़ वो मोर जो बरसात में नाचता था आँखें भीग आती थी, तेरी याद दिलाता था वो चिड़िया जो रोज़ दाना चुगने जाती थी हक़ीक़त में वो तुम्हें ढूंँढने आती थी वो कबूतर जो सब सेे सयाना था मेरे पास बैठ कर, सुनता तेरा अफ़साना था तेरी आँखें, तेरी ज़ुल्फ़ें, तेरी ख़ामोशी, तेरी बातें जो भी मैं लिखता, वो सब कुछ पढ़ता वो ख़त देने को तुझे, हर दिशा में उड़ता हज़ारों कोशिशों के बा'द वो नाकाम हो चुका है उड़ते उड़ते थक गया है, गिर कर मर चुका है अब तो लौट आओ वो ख़ेतों में उगती फ़सल, जहाँ पनपती थी मेरी ग़ज़ल वो गाँव का तालाब, जहाँ ऊगा था सुंदर कमल तालाब किनारे वो कीचड़ जिस से मैं ने ताजमहल बनाया था मेरी रूह क़ैद थी, उस में तेरा साया था एक दिन सुनामी आई, सब कुछ बह गया वो मुहब्बत का ताजमहल, वहीं पर ढह गया सब तबाह हो गया, कुछ न बचा अब बस "प्रीत" बाकी था तेरी याद में लिखता रहता रोज़ थोड़ा थोड़ा मरता रहता एक दिन ऐसा आया सब्र इंतहा कर गया तेरी याद में रोते रोते तेरा "प्रीत" मर गया अब कुछ भी न रहा, कुछ भी न बचा सब कुछ शमशान हो चुका है, अब तो लौट आओ
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