ये कैसी लज़्ज़त से जिस्म शल हो रहा है मेरा ये क्या मज़ा है कि जिस से है उज़्व उज़्व बोझल ये कैफ़ क्या है कि साँस रुक रुक के आ रहा है ये मेरी आँखों में कैसे शहवत-भरे अँधेरे उतर रहे हैं लहू के गुम्बद में कोई दर है कि वा हुआ है ये छूटती नब्ज़, रुकती धड़कन, ये हिचकियाँ सी गुलाब ओ काफ़ूर की लपट तेज़ हो गई है ये आबनूसी बदन, ये बाज़ू, कुशादा सीना मिरे लहू में सिमटता सय्याल एक नुक्ते पे आ गया है मिरी नसें आने वाले लम्हे के ध्यान से खिंच के रह गई हैं बस अब तो सरका दो रुख़ पे चादर दिए बुझा दो
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