Kuch Alfaaz

इतना क्यूँ नाराज़ हो मुझ पर यूँँ मत डाँटो अब्बू जी मैं हूँ नन्हा-मुन्ना बच्चा इतना जानो अब्बू जी यूँँ मत डाँटो अब्बू जी तुम भी पहले बच्चे ही थे ये मत भूलो अब्बू जी नटखट भी मुझ जैसे ही थे ये मत भूलो अब्बू जी जिस दिन ज़िद फ़रमाई होगी दादास और दादी से उस दिन मार भी खाई होगी दादास और दादी से बचपन नाम शरारत का है तुम भी समझो अब्बू जी यूँँ मत डाँटो अब्बू जी शैतानी भी करते होंगे सच बतलाओ अब्बू जी मन-मानी भी करते होंगे सच बतलाओ अब्बू जी तोड़ भी डालें होंगे तुम ने खेल खिलौने चाचा के और कभी कर डाले होंगे कपड़े गंदे दादा के सारी बातें याद करो फिर मुझ को देखो अब्बू जी यूँँ मत डाँटो अब्बू जी नाग़ा भी हो जाती होगी हफ़्ते में स्कूल कभी पढ़ते पढ़ते रोज़ सबक़ को बैठे होंगे भूल कभी टीचर जी ने ग़ुस्सा हो कर तुम को मुर्ग़ बनाया होगा हँसते होंगे सब हम-जोली ख़ूब मज़ा फिर आया होगा जो कुछ मुझ से भूल हुई है मुआ'फ़ भी कर दो अब्बू जी यूँँ मत डाँटो अब्बू जी

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