“अधूरी प्यास” आदत नहीं जाती मिरी मैं देखता हूँ तेरे घर को आज भी है एक आदत मुझ में अब भी बाक़ी सी कुछ देर तकता हूँ चले जाता हूँ फिर सब पूछते क्या है भला दिल में तिरे ख़ामोश आता जाता है क्यूँँ हर दफ़ा तस्वीर देखा करता है वो जा चुकी है फिर भी ये दिल मानता बिल्कुल नहीं क्यूँँ चैन भी पड़ता नहीं आख़िर करूँ तो क्या करूँ ख़ुद से ही बातें करता हूँ वो लम्स वो लम्हें मुझे अब भी हैं याद बरसात का मौसम था और तू हाथ मेरा थाम के चलती गई बिन मुस्कुराए बात करते ही नहीं थे हम कभी फिर कैसा मेरे वक़्त ने ये खेल रचकर बे-सबब क्यूँँ ग़म दिया अब उलझा ही रहता हूँ मैं रेशम की कोई डोर सा है एक आदत जो नहीं जाएगी अब है इक अधूरी प्यास कुछ आसानी से बुझने नहीं वाली मिरी
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