"अहले-ज़रे-अहले-क़लम" अहले-ज़रे-अहले-क़लम बहुत कम होते कई सदियों बा'द तो वो हमें नसीब होते सदा ही वो जहाँ में मर्गे-जावेदाँ ही होते तमसील उन की बेमिसाल ही होती है लिखी हुई हर नफ़्स कमाल की होती है क़ुर्बते-यक-नफ़स हर लफ़्ज़ में खूब होती है सुलगते हुए चराग़ों अभी तो थोड़ा भड़को अपने रौशनी से तहरीरी को यु रौशन कर दो उन के कलाम का एहतराम अब तो ख़ूब कर लो
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