Kuch Alfaaz

आग का ज़ाइक़ा हर ज़बाँ पर सुलगता हुआ ज़ख़्म था रात का आहनी दर समुंदर की जानिब खुला आग ही आग थी क़तरा-ए-आब पुर-कार सा ख़्वाब था रात का आहनी दर जहन्नुम की जानिब खुला रास्तों ने कहा क्यूँँ हुजूम-ए-फ़रावाँ का अंजाम इबरत हुआ कौन इबरत के एहसास को मानता मौत को ज़िंदगी ज़िंदगी को जहन्नुम फ़साना तमस्ख़ुर का हैरत हुआ हम-सफ़र थे वो एक दूसरे के लिए क़ुर्ब उन का मगर आतिश-ए-ख़ौफ़ था मौज से मौज लड़ती हुई मौज से मौज नद्दी के आलाम में जैसे ढलती हुई खिड़कियाँ रहगुज़र पर मुक़द्दर की मानिंद खुलती रहें जो तमाशाई उन के अँधेरों से उभरा वो जलता गया वो तो नन्हा था मा'सूम था उस को सूरज का या चाँद का अक्स सब ने कहा वो भी जलने लगा वो भी बहते लहू में पिघलने लगा वो तो नन्हा था मा'सूम था वो मसीहा था वो आख़िरी नूर था उस की तक़दीर में मर्ग बे-कार क्यूँँ आज लिक्खी गई

Balraj Komal
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