Kuch Alfaaz

हमें क्या चाँदनी की रात क्या रातों की तारीकी बस इतना है कि रौशन रात में गर तेज़ चलना ही ज़रूरी हो तो चल सकते हैं वर्ना चाँदनी की ज़र्द चादर में छुपे भेदों भरे फ़ित्ने सफ़र करने नहीं देते अंधेरे में हमें फ़ित्नों के सर पर पाँव रख कर बढ़ते जाना दश्त में आसान रहता है

Ehsan Akbar
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