Kuch Alfaaz

दश्त-ए-जाँ में सलीब-ए-अना पर लटकते हुए सर-बुरीदा ख़यालात की सिसकती हुई सरगोशियों में फ़ना और बक़ा लम्हा-ए-तक़्सीम में मुंजमिद हो चुके ऐ मेरे ख़ुदा

Tahir Hanfi
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