'ऐसा क्यूँँ होता है' ऐसा क्यूँँ होता है जाता है कोई तो लौट के फिर न वो आता दुबारा ऐसा क्यूँँ होता है चंदा के जाने से लगता फ़लक ये सूना सारा दुनिया ये प्यार की दुश्मन इस सेे न पार पाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है मौला अपनों से हार जाता है दिल ऐसा क्यूँँ होता है दिल जो बिछड़ते हैं दिन न गुज़रते हैं शा में न कटती हैं रातें न छटती हैं लगता नहीं कहीं दिल ये बेचारा ऐसा क्यूँँ होता है रहती हैं आँखें नम हो नहीं पाता है गुज़ारा वादे किए थे उस ने जो वादे थे उस के सारे झूठे जितना उसे था कल चाहा ख़ुद से हैं आज उतने रूठे ऐसा क्यूँँ होता है भूलना चाहूँ तो दिल को मनाऊँ तो दिल न समझता है मुझ सेे उलझता है करता है उस पे ही बस ये इशारा ऐसा क्यूँँ होता है जब भी यूँँ होता है दिल ये हो जाता बे-सहारा
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