Kuch Alfaaz

“अजब सादा सा लड़का था” अजब सादा-सा लड़का था जो मेरे साथ पढ़ता था उसे ग़म भी थे लेकिन वो सदा हँसता ही रहता था किसी के साथ भी जाऊँ कभी रोका नहीं उस ने उसे मैं दोष जो भी दूँ कभी टोका नहीं उस ने सदा बस प्यार की बातें किया करता था वो मुझ सेे मेरे कपड़े हटा कर तिल कभी देखा नहीं उस ने बहुत इज़्ज़त मुझे देता अदब से बात करता था बयाँ मैं कर नहीं सकती वो मुझ पे कितना मरता था मुझे वो एक माँ जैसे सलीक़े सब सिखाता था दुपट्टा इस तरह ओढ़ो मुझे ये भी बताता था शरारत में अगर होता मेरी चीज़ें छुपा देता अगर मैं रूठने लगती मुझे सीने लगा लेता मेरे बालों को सुलझा कर मेरी चोटी बनाता था किसी दादी के जैसे वो कहानी भी सुनाता था अजब सादा-सा लड़का था जो मेरे साथ पढ़ता था

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