ज़ालिम दुनिया अजीब कश्मकश है ज़िन्दगी यारों ना जी रहे हैँ और ना मर रहे हैँ अदब कि बात जो कहते हैँ वही लोग बेइंतेहा बेअदब हैँ मायूस फिर लौटा हूँ उस कूचे से सब लोग वहाँ के मसरूफ़ हैँ यूँँ ना कोई सितम करें किसी पर मांगू अपना हक़ तो ख़ैरात देते हैँ अदा तो उस ज़ालिम कि ना पूछिए चोट दे के पूछते हैँ भला हाल कैसे हैँ क्या यही दौर ए जहाँ का रीवायत है? ख़ाकनशिनो को भी ख़ाक में मिलाते हैँ
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