“अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं” ख़्वाबों की छतरियों तले जब कोई मेरी उदासी का शबब पूछता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं किसी क़फ़स में सदियों से बैठे किसी मुज़रिम की उदास आँखों से निकलती हुई बूँद जब उस के गालों को सहलाती है या किसी अनचाहे मौसम की कोई बहार मुझे पुकारती है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं अर्श के मानिंद कोई था मेरे लिए कभी उस की याद में तो कभी उस के साथ गुज़रे लम्हों में खोने की तलब जब बेचैन करती है एक आह दिल से निकलती है जब कोई ग़म मन में तूफान लाता है अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं जिसे ख़ुदा मानकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था मैं ने जिस की ओर उस के दामन में भीड़ हज़ारों की है गै़रों से यूँँ मुख़्तलिफ़ होने की तलब उस के दिल को ज़रा भी नहीं तड़पाती जब ये ख़याल मन में उठता है मेरे तो अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं मेरी ख़ुद्दारी का शबब उसे पसंद नहीं मेरे एहसासों की जिसे क़दर नहीं जिस के लिए तड़पा है दिन रात ये दिल उसे मेरे ख़ुश रहने की कोई फ़िक्र नहीं छोड़ दिया उसे भी कोई ग़ैर समझकर जो अपना बना कर गै़रों सा रहा अक़्सर फिर भी जब उस की याद सताती है मुझे अक़्सर ख़ामोश हो जाता हूँ मैं
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