“अलार्म” धूप कुछ मिली ही थी फूल कुछ खिले ही थे दूरियाँ हटी ही थीं और हम मिले ही थे फिर ख़याल माज़ी के एक अलार्म की तरहा नींद से जगा बैठे ख़्वाब इक मिटा बैठे फासले बढ़ा बैठे
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