“अमलतास” याद है अमलतास का वो पेड़ जो तुम को मैं दिखाया करता था जिस के पीले फूल बहुत पसंद आए थे तुम्हें. वो गुलमोहर जिस के नीचे बैठ कर एक शाम तुम ने खोल डाले थे दिल के सब राज़ मेरे सामने. वो बेंच जिस पर बैठ कर हम ने आख़िरी सेल्फ़ी ली थी. वो बेंच, वो गुलमोहर, वो अमलतास सब आज भी वहीं है. तुम्हारा शहर अब बहुत दूर हो गया है. लौट कर आ सकता था तुम्हारे शहर मगर (जैसे गुलज़ार साहब कहते हैं) रास्ते में दरिया पड़ते हैं और पुल सारे तुम ने जला दिए थे.
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