Kuch Alfaaz

शिद्दत-ए-दर्द-ओ-अलम से जब भी घबराता हूँ मैं तेरे नग़्मों की घनी छाँव में आ जाता हूँ मैं ज़िंदगी का आइना ये है तिरे फ़न का कमाल है उधर हद्द-ए-फ़लक तक तेरी पर्वाज़-ए-ख़याल चल गया सारे दिलों पर तेरा सेहर-ए-सामरी जावेदाँ ऐ अमृता-प्रीतम है तेरी शाइ'री शिद्दत-ए-एहसास हो तो ख़ुद सँवर जाता है फ़न रौशनी होती है कुल दुनिया में जब जलता है मन सर-फिरे कुछ अहल-ए-फ़न मारे हुए तक़दीर के यूँँही बे-समझी में हैं दुश्मन तिरी तहरीर के दुश्मनों के वार से डरती न घबराती है तू लोग पत्थर फेंकते हैं फूल बरसाती है तू तेरे फ़न के मो'तरिफ़ होंगे वो वक़्त आने को है फूल तेरे फ़न का हर गुलशन को महकाने को है

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