अंदेशा खो जाने का उम्मीद कुछ पाने की हुज़्न-ओ-मसर्रत हमारे अपने इख़्तियार के अंदेशा दीमक है जो मसर्रत के दरख़्तों की जड़ों को चाटती रहती है तुम बे-अंदेशा क्यूँ नहीं हो जाते कि पैदाइश से मौत तक ज़िंदगी के लम्हों को तुम उन के मआल-ए-मुतअय्यना से हट कर नहीं जी सकते
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