Kuch Alfaaz

"अपनापन" जाने क्यूँँ घर की टैरिस पर पैरों की आपाधापी जोरों पर होती है जैसे चाँद को छूने जाना है दिन दिन भर मैं धूप में ख़ुद को ऐसे सेका करता हूँ जैसे तन पर धूप रगड़ कर हीरे सा चमकाना है लेकिन वो मतवाला चाँद न जाने क्यूँँ छुप जाता है बादल के पर्दों से हो कर मुझ सेे आँख चुराता है मदमस्त हवाएँ मुझ सेे कुछ ऐसे लिपटा करती हैं जैसे टूटी कश्ती को कोई साहिल मिल जाता है बारिश की बूँदें भी मुझ को जी भर के यूँ पीती हैं उन के दिल की नदियाँ मानो इक मुद्दत से रीती हैं जाने क्या रिश्ता है ये सब इतने अपने लगते हैं अनसोई रातों के भूले बिसरे सपने लगते हैं

Aditya
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