वाक़िआत और यादें छोटी छोटी मामूली बातें हवा से को रौंदने लगती हैं दिमाग़ की बे-शुमार लछ्छियाँ खींचने और उलझने लगती हैं और शिरयानों में लहू पारा बन कर चुभने लगता है
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