Kuch Alfaaz

अर्ज़ी मरे जब कहीं कोई अपना मिरा तो कहाँ से मुकम्मल वो मरता है बोलो मरे हैं सभी राब्ते साथ उस के वही मौत जो किश्त-दर-किश्त आए जले हैं बुझे हैं सभी राब्ते यूँँ मगर वक़्त के इस अजब खेल में तो कई राब्ते ख़ुद मैं खोता चला हूँ जड़ें थी मुहब्बत या यारी में जिन की बस इस ही तरह किश्त-दर-किश्त सा ये मिरी मौत का सिलसिला चल पड़ा है बहुत सा मरा हूँ बहुत ही जिया हूँ मगर साथ में मतलबी मैं बड़ा हूँ तभी तो मुख़ातिब मैं तुम सेे हूँ जिस ने अभी नज़्म ये जो सुनी है पढ़ी है मुझे जानते या नहीं जानते हो मुझे एक छोटी गुज़ारिश है तुम सेे नई जान-पहचान मुझ सेे बनाओ ज़रा सी सही उम्र मेरी बढ़ाओ

kapil verma
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