हमारे सामने हमारा रब मौजूद है मगर हम अपने अपने मस्लक की डेढ़ डेढ़ ईंट वाली मस्जिदों में ख़्वाहिशों के बुत अपनी अपनी बग़लों में दबाए खड़े हैं और हर बार इन बुतों को सज्दा करते हुए हमारा यक़ीन मस्जिद के मीनारों को छू लेता है कि जन्नत में बहती शहद और दूध की नहरों के किनारों पर हूरें हमें ख़ुश-आमदीद कहने को बेताब बैठी हैं अस्फ़ल-उस-साफ़िलीन सज्दों से सर उठे तो अपने अंदर झाँकना तुम जान लोगे हम से बड़ा ना-फ़रमान कोई नहीं
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