Kuch Alfaaz

"औरत की ज़िंदगी" कभी कभी दिल की बात भी बता नहीं पाते सबकी सुनने में अपनी ही सुना नहीं पाते सजाकर रखते हैं जिस घर की दीवारों को उस घर में ही खुलकर मुस्कुरा नहीं पाते अजीब ज़िंदगी है औरत की भी माँ बाप के घर में अपनी जगह बना नहीं पाते जिस घर को चुना है तकदीर ने हमारे लिए उस घर में जा कर घूँघट उठा नहीं पाते अब कौन देखता है चेहरे पे ग़म है या ख़ुशी सबके सामने आँसू भी अब बहा नहीं पाते

Muskan Singh
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