प्यास ऐ धरती तुम भी प्यासी होगी दिन भर धूप में झुलसती होगी तुम्हारी तड़प कोई ना समझे कोई ना जाने प्यास तुम्हारी चलतों के तुम बोझ उठाती गाड़ी मोटर भी सह जाती और तो और हम तुच्छ जीवों को चावल गेहूँ भी दे जाती वर्षा अभी दूर बहुत है ऐ धरती तू मजबूर बहुत है जो बुझती नहीं गर प्यास मेरी तो सोचता हूँ क्या हालत होगी तेरी तुझ में मुझ में बात एक है दोनों के हालात एक हैं मैं भी प्यासा तू भी प्यासी पड़ जाए गर बारिश ज़रा सी फिर मैं भी शीतल तुम भी शीतल हो जाऍंगे देह के भीतर तुझ में भी ऐ धरती शायद प्यार, ख़ुशी और उदासी होगी मैं भी हूँ प्यासा तो ऐ धरती तुम भी प्यासी होगी।
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