ये तेरे हिज्र की आँधी कहाँ ले आई है मुझ को यहाँ हर सम्त इक सूरज सवा नेज़े पे जलता है न सर से धूप उतरती है न साया कोई ढलता है हवा-ए-शाम चलती है न कोई शम्अ'' जलती है फ़लक पर नज्म आते हैं न तो महताब आता है किसी की आँख सोती है न कोई ख़्वाब आता है
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