Kuch Alfaaz

"अजब नहीं है" अजब नहीं हैं कि बिन तुम्हारे वो लफ्ज़ सारे जो मेरे पन्नों पे सो रहे हैं कि जैसे चेहरे को तुम ने फेरा ऐसे करवट बदल रहे हैं अजब नहीं हैं वो शे'र सारे जो थे हमारे हमारी भीगी क़लम में ऐसे समा गए हैं कि जैसे हद्द से गुज़र रहे हो ये कोरे पन्नों पे बह रहे हो अजब नहीं हैं कहा था तुम ने कि सोहेल सुन लो बता रही हूँ जो मेरे मुह से टपक रहा है वो ख़ून ए दिल की ही आदतें हैं ये सब तुम्हारी इनायतें हैं ये सारी मेरी शिकायतें हैं ये जोश-ए-ख़ून-ए-नदामतें हैं इसीलिए मैं ख़फ़ा हूँ तुम से इसीलिए मैं ये कह रही हूँ कि जो भी नज़्में लिखे हो तुम ने तुम्हारी नज़्में नहीं पढ़ूँगी अजब नहीं हैं जो खूँ थूकन में तुम्हारा ख़ून-ए-जिगर बहा था वो ही तो ख़ून-ए-जिगर को मैं ने मेरी इन आँखों पे जब मला था अभी भी लगता हैं जैसे आँखें वो ताज़ा खूँ फिर बहा रही हो अभी भी लगता हैं जैसे लब पर ख़फ़ा ख़फ़ा सी अदा रही हो लहू थूकन की जो थी अदाएं हर एक बूँदों में थी वफ़ाएँ मगर वफ़ाओं से क्या हुआ हैं मगर अदाओं से क्या हुआ हैं सुनो मगर अब हुआ तुम्हारा कहूँ क्या मैं कुछ वो बात क्या थी कि नज़्म मेरी नहीं पढ़ोगी अगर ये सच है तो फिर ये सुन लो कि लग रहा है तुम पढ़ रही हो तड़प रही हो सुलग रही हो सिमट रही हो मगर अब मैं ने तो बा'द मुद्दत के नज़्म लिक्खा हूँ जैसे तैसे कहीं किसी दिन तुम्हारे ख़्वाबों में नज़्म गाऊँ तो ये मत कहना मुझे नहीं कोई नज़्म सुनना तुम अपनी नज़्में भी ले कर जाओ तुम अपनी ग़ज़लें भी ले कर जाओ अगर मुझे भूल जाना चाहो तो सारी क़स में भी ले कर जाओ अजब नहीं हैं ये सारी क़स में ये सारी नज़्में ये सारी ग़ज़लें जो मैं ने पन्नों पर है उतारा ये पन्ने चाहे कि देखे तुम को कि तुम में ऐसी भी क्या कशिश हैं ये पन्ने चाहे पता लगाना कि कौन हो तुम जो इतने दिलकश है लब तुम्हारे बताओ भी क्या है नाम तुम्हारा इन्हें बता दूँ अगर तो फिर ये दीवाने पागल ना जी सकेंगे इन्हें बताना नहीं मुनासिब ये बे-ख़बर हो तभी सही है कि नाम भी अब कहीं नहीं है अजब नहीं हैं वो भीगे पन्नों पे ना लिखा था जो नाम अब तक वो नाम अब मैं छुपा छुपा कर रखूँगा कब तक मुझे ये लगता है कि अब तो तुम्हारा वक़्त भी गुज़र चुका है ये पानी सर से उतर चुका है ना कोई ख़्वाहिश कि तुम अब आओ ना कोई हसरत ना आरज़ू हैं ना कोई हिम्मत बची हैं हम में ना कोई साथी ना गुफ़्तगू हैं अजब नहीं हैं ये नज़्म कह दे जो कुछ भी लिक्खा है, बस भी कर दो लिखोगे कितना बताओ सोहेल अब तुम ही बोलो मैं क्या बताऊँ ये मेरी बातों से बे-ख़बर हैं ये मेरे लफ़्ज़ों का ही असर हैं अजब नहीं हैं मगर ये सुन लो बता रहा हूँ जो मेरे लफ़्ज़ों से मो'अतबर थे वो ही तो तुम थे वो ही तो तुम थे वो ही तो तुम थे

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