“बाप” सख़्तियों में गुज़री सारी ज़िंदगानी बाप की मेरा बचपन खा गया है नौजवानी बाप की अपने दिल की सल्तनत पर सच कहूँ ऐ दोस्तों अच्छी लगती है मुझे ये हुक्मरानी बाप की आज जो कुछ भी है मेरे पास दुनिया में ये सब किब्रिया का फ़ज़्ल है ओर मेहरबानी बाप की जब तलक साँसे चलेंगी तब तलक हर साँस पर याद आएगी ये करना तर्जुमानी बाप की फ़ख़्र है इस बात पर कि शक्ल में तहज़ीब की साथ रखता हूँ हमेशा इक निशानी बाप की मेरी ख़्वाहिश कर नहीं पाया था पूरी याद है आ गया था उस घड़ी आँखों में पानी बाप की बाप की तुर्बत पे गिरकर रो रहा है ज़ार ज़ार क़द्र जिस ने जीते जी इक पल न जानी बाप की चूम कर होंठों से सीने से लगाकर रो पड़े सामने तस्वीर जब आई पुरानी बाप की याद आएगी हमेशा लम्हा लम्हा हर क़दम हाँ मुहब्बत से भरी वो डाँट खानी बाप की जी में आता है मिरे हर पल ये रह रह कर शजर ख़ून के क़तरो से लिक्खूँ मैं कहानी बाप की
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