"घर-बार" बाप कमाता है और बेटे सोते हैं हर घर में कुछ ऐसे नमूने होते हैं जिन को समझ आती ही नहीं ज़िम्मेदारी कुछ सालों के बा'द बहुत वो रोते हैं दाँव से बढ़ कर दाँव दिखाने लगते हैं पतझड़ में हम छाँव दिखाने लगते हैं शहरों की ता'रीफ़ कोई जब करता है उस को अपना गाँव दिखाने लगते हैं वो घर से जब घर को बनाने निकल पड़े सर पे सारे बोझ उठाने निकल पड़े ज़िम्मेदारी ने ऐसा मजबूर किया नन्हे-मुन्ने बच्चे कमाने निकल पड़े ईद दिवाली होली आती जाती है घर जाने की नौबत ही नहीं आती है ज़िम्मेदारी तुझे कैसे समझाएँ हम घर वालों की याद हमें भी आती है ख़ुद को घर से दूर बसाना पड़ता है फिर सर पे हर बोझ उठाना पड़ता है गीत ग़ज़ल लिखना इतना आसान नहीं पहले तो महबूब गँवाना पड़ता है छत आँगन दीवार उठा ले जाएँगे या'नी हम घर-बार उठा ले जाएँगे देखोगे जो क़ातिल नज़रों से हम को हो जाएगा प्यार उठा ले जाएँगे
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